bhagalpur: Often dead bodies are not destined to shroud and bodies are being shed in Ganges in tie in plastic – उफ! लावारिश लाशों को कफन भी नसीब नहीं, प्लास्टिक में बांध गंगा में बहाई जा रहीं , Bhagalpur Hindi News

भागलपुर में लावारिश लाशों का सम्मानपूर्वक दाह संस्कार की बात तो छोड़ दीजिए कफन भी नसीब नहीं हो रहा है। दो मीटर प्लास्टिक और पावभर नारियल की रस्सी में बांधकर लाशों को गंगा में बहाया जा रहा है। हालांकि कोई पुलिस अफसर इस बात को सीधे कबूल करने को तैयार नहीं होता है लेकिन हकीकत में हर साल जिले में करीब 40-42 लावारिश लाशों का यही हश्र हो रहा है। शव को टेम्पो या ठेले पर लादकर श्मशान घाट तक पहुंचाया जाता है।

पुलिस सूत्रों ने बताया कि सबसे अधिक लावारिश लाशें रेल थाने में आती हैं। सालभर में 25 से अधिक ऐसी लाशें रेलवे में बरामद होती हैं, जिनकी पहचान नहीं हो पाती है। जिलेभर के थानों में यह संख्या 15 के आसपास होती है। बरारी थानाध्यक्ष ने बताया कि मायागंज अस्पताल में इस साल चार लावारिश लाशें आईं। लाश को पास्टमार्टम के बाद 72 घंटे तक  पहचान के लिए रखा जाता है। उसके बाद उसके दाह संस्कार का नियम है। थानाध्यक्षों ने बताया कि हर थाने को कंटीजेंसी मद में मिलने वाली राशि में दो हजार तक दाह-संस्कार पर खर्च करने का प्रावधान है। रेल थाना क्षेत्र की लाशों के लिए रेलवे अलग से ढाई हजार देता है।

 एक थानाध्यक्ष ने बताया कि शहरी क्षेत्र के थाने या अस्पताल से पोस्टमार्टम हाउस तक लाश पहुंचाने में ही दो हजार खर्च हो जाते हैं। पांच सौ रुपये ठेले या टेम्पो वाले को और हजार-डेढ़ हजार प्राइवेट डोम को देने पड़ते हैं। एक पुलिस अफसर के अनुसार शहरी क्षेत्र के शव के अंतिम संस्कार तक पांच हजार से अधिक खर्च हो जाता है जबकि ग्रामीण क्षेत्र के थानों से लाश को पोस्टमार्टम हाउस और वहां से श्मशानघाट तक सात हजार तक खर्च हो जाता है। प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि घाट पहुंचने पर पुलिसकर्मी या चौकीदार वहां मौजूद डोमों के जरिए ज्यादातर लाशों को जैसे-तैसे गंगा में बहा देते हैं। 

कभी-कभार अधजली लकड़ियों से पूरा करते हैं रस्म
एक और बात। वहां मौजूद डोम पहले की लाशों को जलाने में बची अधजली लकड़ियों को एकत्र करके रखते हैं। यदि पुलिसकर्मी या चौकीदार ने अलग से उन्हें पैसे दिए तो उन अधजली लकड़ियों से लाश को जलाने का रस्म पूरा करते हैं। फिर उस अधजली लाश को गंगा में बहा देते हैं। मानवाधिकार संगठन के महासचिव अजीत कुमार सिंह कहते हैं कि दाह-संस्कार के लिए पर्याप्त राशि के साथ लाश ढोने के लिए एंबुलेंस की व्यवस्था होनी चाहिए।   

विक्रमशिला पुल के रेलिंग पर झूलती मिली थी लाश
 एक घटना को लोग आज भी याद करते हैं। पीरपैंती से बरामद एक लावारिश लाश को पोस्टमार्टम के बाद पुलिसवालों ने दाह-संस्कार के बदले विक्रमशिला पुल से गंगा में फेंकने की कोशिश की थी। उन्हें पता नहीं चल पाया कि प्लास्टिक में बंधी लाश की रस्सी रेलिंग के एंगल में ही फंस कर रह गई है। बाद में पुल से आते-जाते लोगों ने झूलती लाश को देखा। उसके बाद पुलिस आई। लाश उताकर दोबारा पोस्टमार्टम हुआ। फिर उसका दाह-संस्कार हुआ। पुलिस की इस करतूत पर काफी बवाल मचा था। उसपर वहां के थानाध्यक्ष सस्पेंड हुए थे। 

रेलवे में लावारिश लाशें
2017 में 25
2018 में 27

डीआईजी विकास वैभव बताया कि सभी थानाध्यक्षों को कहा गया है कि लावारिश लाशों का सम्मानपूर्वक दाह-संस्कार किया जाना चाहिए। इस नियम का हर हाल में पालन होना चाहिए। कोताही पाई गई तो संबंधित थानाध्यक्ष पर कड़ी कार्रवाई होगी। 

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